प्रारंभिक जीवन और बचपन

फील्ड मार्शल सैम होर्मूसजी फ्रेमजी जमशेदजी मानेकशॉ का जन्म 3 अप्रैल 1914 को ब्रिटिश भारत के अमृतसर (अब पंजाब, भारत) में हुआ था। उनके पिता होर्मूसजी मानेकशॉ पारसी समुदाय से थे और पेशे से एक डॉक्टर थे। उनकी माँ हिरेबाई मानेकशॉ थीं। सैम बचपन से ही साहसी और जिज्ञासु प्रवृत्ति के थे। उनका पालन-पोषण एक अनुशासित और शिक्षित परिवार में हुआ, जिससे उनमें नेतृत्व और कर्तव्यपरायणता के गुण विकसित हुए। उनके पिता चाहते थे कि वह मेडिकल की पढ़ाई करें, लेकिन सैम को सेना में जाने की इच्छा थी। इस कारण उन्होंने भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए), देहरादून में दाखिला लिया। उनकी पढ़ाई नैनीताल के शेरवुड कॉलेज में हुई, जहाँ वे पढ़ाई और खेल-कूद दोनों में उत्कृष्ट थे। उनका सैन्य करियर 1932 में शुरू हुआ जब वे आईएमए के पहले बैच का हिस्सा बने और 1934 में स्नातक हुए।

सैन्य करियर

  1. ब्रिटिश भारतीय सेना में प्रवेश

1 फरवरी 1935 को सैम मानेकशॉ को ब्रिटिश भारतीय सेना की 12वीं फ्रंटियर फोर्स रेजीमेंट में नियुक्त किया गया। उनकी पहली तैनाती वजीरिस्तान (अब पाकिस्तान में) में हुई।

  1. द्वितीय विश्व युद्ध में योगदान

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) के युद्धक्षेत्र में जापानी सेना के खिलाफ लड़ने भेजा गया। 1942 में बर्मा में एक ऑपरेशन के दौरान उन्हें कई गोलियां लगीं, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए। इसके बावजूद, उन्होंने अपनी पोस्ट पर डटे रहते हुए नेतृत्व किया। उनकी वीरता को देखते हुए, मेजर जनरल डेविड कोवान ने उनकी तत्काल पदोन्नति की।

  1. आज़ादी के बाद का सैन्य करियर

आजादी के बाद, वे भारतीय सेना का हिस्सा बने और विभाजन के समय भारतीय सैनिकों को सही तरीके से व्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने भारत-पाकिस्तान, भारत-चीन और 1971 के युद्धों में अपने अद्वितीय नेतृत्व कौशल का प्रदर्शन किया।

भारत-पाकिस्तान युद्धों में भूमिका

  1. 1947-48 का युद्ध: इस युद्ध में पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर पर हमला किया था। सैम मानेकशॉ ने इस युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और उनकी रणनीति के कारण भारतीय सेना को सफलता मिली। उनकी युद्ध नीति और तत्काल निर्णय लेने की क्षमता ने पाकिस्तान को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
  2. 1962 का भारत-चीन युद्ध: इस युद्ध में अरुणाचल प्रदेश (तब नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी) में उन्होंने सेना का नेतृत्व किया। हालांकि इस युद्ध में भारत को नुकसान हुआ, लेकिन सैम मानेकशॉ ने अपने सैनिकों का मनोबल ऊँचा रखा। इस युद्ध से उन्हें महत्वपूर्ण सैन्य अनुभव प्राप्त हुआ।
  3. 1965 का भारत-पाक युद्ध: इस युद्ध के दौरान वे पश्चिमी कमान के प्रमुख थे और उन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ प्रभावी सैन्य योजनाएँ बनाई, जिससे भारत को सामरिक लाभ मिला। उनकी युद्ध रणनीति के कारण भारत ने पाकिस्तान को करारा जवाब दिया।
  4. 1971 का भारत-पाक युद्ध: यह युद्ध उनकी रणनीतिक कुशलता के लिए जाना जाता है। इस युद्ध में उन्होंने भारतीय सेना का कुशल नेतृत्व किया और पाकिस्तान के 90,000 से अधिक सैनिकों को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर किया। इस युद्ध के परिणामस्वरूप बांग्लादेश एक स्वतंत्र राष्ट्र बना। सैम मानेकशॉ ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से कहा था, “आई गारंटी यू 100% विक्ट्री,” और उन्होंने यह वादा निभाया।

युद्ध के दौरान उनकी रणनीतियाँ

  • सटीक योजना: उन्होंने युद्ध के पहले ही सभी संभावनाओं का विश्लेषण कर सही रणनीति बनाई।
  • सैनिकों का मनोबल: उन्होंने हमेशा अपने सैनिकों को प्रेरित किया और उनकी जरूरतों को समझा।
  • दुश्मन की कमजोरियों का फायदा: उन्होंने पाकिस्तान की कमजोरियों को पहचाना और उसी आधार पर हमले किए।
  • कूटनीतिक समझ: उन्होंने केवल सैन्य बल का उपयोग ही नहीं किया बल्कि राजनीतिक स्थिति को भी समझकर निर्णय लिए।

महत्वपूर्ण पद और तैनातियाँ

सैम मानेकशॉ ने अपने सैन्य करियर के दौरान निम्नलिखित महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया:

  1. 1935 – सेकेंड लेफ्टिनेंट, ब्रिटिश भारतीय सेना
  2. 1942 – मेजर, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वीरता के लिए पदोन्नत
  3. 1947 – लेफ्टिनेंट कर्नल, भारतीय सेना में विभाजन के बाद नई जिम्मेदारियाँ
  4. 1952 – ब्रिगेडियर, सैन्य योजना एवं प्रशासन में योगदान
  5. 1961 – मेजर जनरल, रक्षा नीति और युद्ध रणनीति में प्रमुख भूमिका
  6. 1964 – लेफ्टिनेंट जनरल, भारतीय सेना की पश्चिमी कमान का नेतृत्व
  7. 1969 – सेना प्रमुख (चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ), भारतीय सेना का सर्वोच्च पद
  8. 1973 – फील्ड मार्शल, भारत में सर्वोच्च सैन्य सम्मान प्राप्त करने वाले पहले व्यक्ति

फील्ड मार्शल का दर्जा

1973 में, उन्हें भारत के पहले फील्ड मार्शल का दर्जा दिया गया, जो भारतीय सेना में सर्वोच्च रैंक होती है। यह सम्मान केवल उन्हीं सैन्य अधिकारियों को दिया जाता है जिन्होंने अपने नेतृत्व में ऐतिहासिक उपलब्धियाँ हासिल की हों। उनका सैन्य करियर पांच दशकों तक चला और वे भारतीय सेना के सबसे प्रतिष्ठित जनरलों में से एक बन गए।

पुरस्कार और सम्मान

सैम मानेकशॉ को उनकी वीरता और उत्कृष्ट नेतृत्व के लिए कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले।

  • 1968 में पद्म भूषण
  • 1972 में पद्म विभूषण
  • ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर (ब्रिटिश सरकार द्वारा)
  • भारत सरकार द्वारा विशेष सैन्य सम्मान
  • विभिन्न सैन्य पदक और प्रशस्ति पत्र

व्यक्तिगत जीवन

सैम मानेकशॉ का व्यक्तिगत जीवन सरल और अनुशासित था। उन्होंने सिलू मानेकशॉ से विवाह किया था और उनके दो बच्चे थे – शेरिल और मया। वे एक अच्छे पिता और पति थे और अपने परिवार के साथ शांतिपूर्ण जीवन जीना पसंद करते थे। सेवानिवृत्ति के बाद, उन्होंने वेलिंगटन (तमिलनाडु) में अपना स्थायी निवास बनाया और वहीं शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत किया। वे बेहद सादगीपूर्ण जीवन जीते थे और अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया।

प्रसिद्ध विचार और कथन

सैम मानेकशॉ अपनी स्पष्टवादिता और बेबाक बयानों के लिए प्रसिद्ध थे। उनके कुछ प्रसिद्ध कथन इस प्रकार हैं:

  • “यदि कोई व्यक्ति कहता है कि उसे मौत का डर नहीं है, तो वह या तो झूठ बोल रहा है या वह गोरखा है।”
  • “मेरे पास भारत की रक्षा करने के लिए बहुत अच्छी सेना है, मुझे राजनीति में घसीटने की आवश्यकता नहीं है।”
  • “एक सैनिक की सबसे बड़ी ताकत उसका आत्मविश्वास और साहस होता है।”

निधन

27 जून 2008 को सैम मानेकशॉ का निधन वेलिंगटन, तमिलनाडु में हुआ। वे 94 वर्ष के थे। उनके निधन पर पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। हालाँकि, उन्हें राजकीय सम्मान नहीं दिया गया, फिर भी भारतीय सेना ने उन्हें पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी। उनके योगदान को हमेशा याद किया जाएगा और वे भारतीय सैन्य इतिहास में अमर रहेंगे।

निष्कर्ष

सैम मानेकशॉ न केवल एक कुशल सेनापति थे बल्कि एक प्रेरणादायक नेता भी थे। उनकी रणनीति, नेतृत्व और अनुशासन ने भारतीय सेना को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। उनका जीवन समर्पण, साहस और देशभक्ति का प्रतीक है। वे एक ऐसे सैन्य अधिकारी थे जिन्होंने न केवल युद्ध के मैदान में बल्कि अपने पूरे जीवन में अपने आदर्शों को बनाए रखा। उनकी रणनीति और नेतृत्व क्षमता के कारण ही भारत ने 1971 के युद्ध में पाकिस्तान पर ऐतिहासिक जीत हासिल की। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व केवल शक्ति में नहीं बल्कि सही निर्णय लेने की क्षमता और दूरदृष्टि में होता है। उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता और भारतीय सेना में उनका नाम हमेशा सम्मान के साथ लिया जाएगा।

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